नाम से पहचान तो सबकी है और आसान भी,
मिले पहचान काम से तो मौज कुछ और है.
माही यादव. एक नाम. ठीक ऐसे ही जैसे किसी भी लड़की का नाम होता है. सुनने-समझने में बिल्कुल सामान्य सा लगता है कि, व्यक्ति का एक नाम होता है. ऐसा ही एक नाम है यह भी. लेकिन ऐसा कतई नहीं है. बहुत कुछ खास है इस नाम में. जैसे हर व्यक्ति की नाम से पहचान होती है ना, वैसे ही एक और पहचान होती है काम से. अब काम से पहचान बनाना कोई आसान तो है नहीं, कि चाहा और हो गया. रेस में दौड़ने वाला हर अश्वारोही विजेता तो नहीं बन जाता. विजेता वही होता है जो जीतने की धुन लेकर दौड़ता है. जिसे पथरीली राहें भी गुलशन की क्यारियां लगती हैं. आकाश की कड़कती डरावनी बिजली जिसे घने अंधेरे में राह दिखाने वाली मंजिल-ए-रौशनी लगती है. हां, वो ही जीतता है और कहलाता है विजेता. जीत के सेहरा का हकदार होता है. एडवोकेट माही यादव ऐसा ही एक नाम है. वर्तमान में राजस्थान उच्च न्यायालय में सरकारी की ओर से पैरवी करने वाली अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG). खास बात यह है कि राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में सरकार की ओर से नियुक्त 11 AAG में से एडवोकेट माही यादव एकमात्र महिला अतिरिक्त महाधिवक्ता हैं.
‘द कलंदर पोस्ट’ की खास सीरीज ‘अधिवक्ता’ में आज हम बात कर रहे हैं राजस्थान हाईकोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) एडवोकेट माही यादव की.
अच्छे अंक से पास हुई तो पिता ने घोड़ी पर बिठाकर किया सम्मान
किसान परिवार में जन्मी पली बढ़ी माही यादव को मेहनतकश होने की घुट्टी जन्म से ही मिली. पिता ने बेटी की परवरिश भी बेटों जैसी की. बेटी माही ने जब दसवीं कक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की तो किसान पिता बीआर यादव ने बेटी को घोड़ी पर बिठाकर शोभायात्रा निकाल खुशी का इजहार किया. बेटियों को कम आंकने वाले समाज के लिए यह बड़ा सकारात्मक संदेश था. जयपुर के कोटपूतली के भैंसलाना गांव तो चिर-परिचित था अपनी इस बेटी से. लेकिन आज बेटी से भी है पहचान गांव की.

राजस्थान यूनिवर्सिटी से हैं एलएलबी पासआउट, नामी चैंबर से शुरू की थी प्रैक्टिस
अपनी स्कूली शिक्षा गांव से पूरी करने के बाद माही ने राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से एलएलबी की. कानून की पढ़ाई के दौरान ही इन्होंने सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता जैसे विषयों में गहरी रुचि दिखानी शुरू कर दी थी. इनकी सोच हमेशा से स्पष्ट थी कि कानून सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने का एक प्रभावी माध्यम भी है. वर्तमान में राजस्थान हाईकोर्ट जज समीर जैन के चैंबर से इन्होंने अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी. यहां इन्होंने न केवल कानून की गहरी समझ विकसित की, बल्कि व्यवहारिक रूप से मुकदमों की बारीकियों को भी समझा. इनकी विश्लेषण क्षमता, सूझबूझ और पेशे के प्रति ईमानदारी ने इन्हें एक मजबूत वकील के रूप में स्थापित कर दिया.
माही यादव की एक जनहित याचिका ने बदला सैनिक स्कूलों में लड़कियों के दाखिले का भविष्य
कॉलेज के दिनों में माही यादव की नजर एक ऐसे विज्ञापन पर पड़ी जिसने उन्हें झकझोर कर रख दिया. यह विज्ञापन सैनिक स्कूलों में प्रवेश को लेकर था, लेकिन इसमें लिखा था— “सिर्फ लड़कों के लिए”. माही के परिवार की कई पीढ़ियाँ भारतीय सेना में सेवा दे चुकी थीं, और उन्होंने हमेशा सैनिक स्कूलों में लड़कियों के प्रवेश न होने पर चिंता जताई थी. कुछ साल बाद, एक बार फिर ऐसा ही विज्ञापन इनके सामने आया. लेकिन इस बार माही केवल सवाल उठाने तक सीमित नहीं रहीं. अब वह एक वकील बन चुकी थीं और महिला अधिकारों के प्रति पूरी तरह जागरूक थीं. लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के अपने संकल्प के साथ, वर्ष 2016 में उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की. इस याचिका में इन्होंने सैनिक स्कूलों में लड़कियों को भी प्रवेश देने की मांग की.
माही की कानूनी लड़ाई रंग लाई. कोर्ट ने केंद्र सरकार को नीतिगत बदलाव करने के निर्देश दिए. इस फैसले के बाद सैनिक स्कूलों में लड़कियों के दाखिले का मार्ग प्रशस्त हुआ. एडवोकेट माही यादव की यह पहल सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं थी, बल्कि यह एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत थी, जिसने लड़कियों के लिए नए अवसरों के द्वार खोल दिए.

एडवोकेट माही यादव पेशे के प्रति ईमानदारी और व्यवहार कुशलता से बनी AAG
एडवोकेट माही यादव ने अपने कानूनी करियर में न केवल न्याय के लिए संघर्ष किया बल्कि अपने पेशे के प्रति गहरी ईमानदारी और जिम्मेदारी भी निभाई. इनकी सटीक कानूनी समझ, नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और प्रभावी तर्कशक्ति ने इन्हें एक सशक्त अधिवक्ता के रूप में स्थापित कर दिया. माही ने कई मामलों में समाज के वंचित वर्गों के हक की पैरवी की और न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाई. सैनिक स्कूलों में लड़कियों के प्रवेश को लेकर इनकी जनहित याचिका इसी समर्पण का उदाहरण है. इन्होंने इसे केवल एक कानूनी लड़ाई के रूप में नहीं, बल्कि लैंगिक समानता के एक व्यापक आंदोलन के रूप में देखा. इनकी व्यवहार कुशलता ने अदालतों में न केवल प्रभावी तर्क प्रस्तुत किए बल्कि सरकार और प्रशासन को नीतिगत सुधारों पर भी विचार करने के लिए प्रेरित किया.
इन्हीं गुणों को देखते हुए राजस्थान की भजनलाल सरकार ने इन्हें अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) के रूप में नियुक्त किया. यह पद केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उनकी योग्यता, निष्पक्षता और अद्वितीय कार्यशैली का प्रमाण है. इनकी यह उपलब्धि न केवल कानून के क्षेत्र में इनके योगदान को दर्शाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा भी है.