नागपुर : आरएसएस का वो मुख्यालय जहां पीएम नरेंद्र मोदी ने देशसेवा, त्याग और समर्पण की दीक्षा पाई. यही वो टकसाल है जिसने पीएम नरेंद्र मोदी को गढ़ा और देश के नेतृत्व के लिए एक प्रभावशाली नेता तैयार किया. आज वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 मार्च को नागपुर में आरएसएस मुख्यालय का दौरा करेंगे जहां वह मोहन भागवत के साथ भविष्य के भारत के निर्माण को लेकर चर्चा करेंगे. राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसकी वजह है इसका समय, जगह और PM नरेंद्र मोदी की भागवत से मुलाकात.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मुख्यालय का दौरा केवल एक औपचारिक यात्रा भर नहीं है, बल्कि यह उस विचारधारा और संगठन के प्रति उनकी आत्मीयता का प्रमाण भी है, जिसने उन्हें एक समर्पित कार्यकर्ता से लेकर भारत के सबसे प्रभावशाली नेता तक का सफर तय करने में प्रेरित किया। यह वही आरएसएस है, जिसने उन्हें राष्ट्रसेवा के लिए तैयार किया, अनुशासन सिखाया और अंततः एक प्रभावशाली नेतृत्व क्षमता प्रदान की। नागपुर की भूमि पर मोदी की यह यात्रा उन मूल्यों और सिद्धांतों को नमन करने जैसा है, जिनके बलबूते उन्होंने अपने जीवन को एक मिशन में परिवर्तित किया।

संघ की छत्रछाया में ऐसे गढ़े गए नरेंद्र दामोदरदास भाई मोदी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक विचारधारा है. एक ऐसा आंदोलन, जो राष्ट्र को सर्वोपरि मानता है और अपने स्वयंसेवकों को समाजसेवा, अनुशासन और त्याग का पाठ पढ़ाता है। नरेंद्र मोदी ने बचपन में ही इस विचारधारा को आत्मसात कर लिया था। 1950 में जन्मे मोदी का झुकाव किशोरावस्था में ही आरएसएस की ओर हुआ और संघ के स्वयंसेवक के रूप में उन्होंने समाजसेवा की दिशा में अपने कदम बढ़ाए। यही वह दौर था, जब उन्होंने अनुशासन, परिश्रम और समर्पण की बारीकियों को करीब से सीखा। गुजरात में प्रचारक के रूप में कार्य करने के दौरान मोदी ने न केवल संगठन कौशल को मजबूत किया, बल्कि विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने की क्षमता भी विकसित की। संघ ने उन्हें एक सुदृढ़ बौद्धिक दृष्टिकोण और राष्ट्रवादी सोच प्रदान की, जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय जनता पार्टी के एक प्रभावीशाली नेता के रूप में स्थापित किया. आज आरएसएस से मिले इसी नेतृत्व कौशल का नतीजा है कि पीएम मोदी ने बीजेपी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बना दिया.
2001 में जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब भी संघ के सिद्धांत उनके निर्णयों और नीतियों के मूल में रहे। उनका ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र भी उसी राष्ट्रवादी सोच का विस्तार था, जो संघ के मूल सिद्धांतों का हिस्सा है। गुजरात से निकलकर जब 2014 में मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तब तक वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुके थे। उनकी शासन शैली में संघ द्वारा सिखाई गई संगठनात्मक क्षमता, नीतियों में दीर्घकालिक दृष्टिकोण और समाज के हर वर्ग तक पहुंचने का जज़्बा साफ़ दिखा। इसी वजह से नरेंद्र मोदी पूरे देश के लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरे.

संघ से अपने रिश्तों पर पोडकास्ट में की बात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेे मशहूर अमेरिकी पॉडकास्टर लेक्स फ्रीडमैन के साथ पॉडकास्ट में संघ के साथ रिश्ते और यहां से सीखे सबक के बारे में बातचीत की. लेक्स ने उनसे सवाल पूछा कि जब आप आठ साल के थे, तब RSS में शामिल हो गए थे, जो हिंदू राष्ट्रवाद के विचार का समर्थन करता है. क्या आप मुझे आरएसएस के बारे में बता सकते हैं? आप पर और आपके राजनीतिक विचारों के विकास पर उनका क्या प्रभाव पड़ा? इसके जवाब में पीएम मोदी ने कहा कि आरएसएस में हमें जो मूल मूल्य दिए गए, उनमें से एक था कि जो भी करो, उसे उद्देश्य के साथ करो. राष्ट्र के योगदान के लिए करो. जैसे मैं पढ़ाई करूं तो इतनी करूं की देश के काम आए. जब मैं व्यायाम करूं तो इतना करूं कि मेरा शरीर भी देश के काम आए. ये संघ के लोग सिखाते रहते हैं. संघ एक बहुत बड़ा संगठन है. लेकिन संघ को समझना इतना सरल नहीं है. इसके कार्य की प्रकृति को सही मायने में समझने के लिए प्रयास करना चाहिए.

पीएम मोदी ने कहा कि देश ही सब कुछ है और जनसेवा ही ईश्वर की सेवा है. यही वैदिक काल से कहा जाता रहा है. यही हमारे ऋषियों ने कहा है, यही विवेकानंद ने कहा है और यही बातें संघ के लोग करते हैं. वामपंथी विचारधाराओं ने दुनिया भर में मज़दूर आंदोलनों को बढ़ावा दिया है. और उनका नारा क्या रहा है? ‘दुनिया के मज़दूरों, एक हो जाओ’, दूसरी तरफ आरएसएस कहता है कि ‘मजदूरों, पूरी दुनिया को एक करो.’ यह शब्दों में एक छोटा सा बदलाव लग सकता है, लेकिन यह एक बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन है. पिछले 100 साल में आरएसएस ने भारत की चकाचौंध से दूर रहकर एक साधक की तरह समर्पित भाव से काम किया है. मेरे सौभाग्य रहा कि ऐसे पवित्र सगंठन से मुझे जीवन के संस्कार मिले.
नागपुर दौरा : जड़ों से जुड़ाव का प्रतीक
नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय की यात्रा प्रधानमंत्री मोदी के लिए किसी भी अन्य राजनीतिक दौरे से अधिक महत्वपूर्ण है। यह वह स्थान है, जहाँ से भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन को दिशा मिली, और यहीं से अनेक नेताओं ने राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरणा पाई। मोदी की यह यात्रा एक ओर उनके संघ से जुड़े अटूट रिश्ते को दर्शाती है, तो दूसरी ओर यह विरोधियों के लिए भी एक संदेश है कि उनकी विचारधारा की जड़ें कितनी गहरी हैं।

आरएसएस मुख्यालय का दौरा प्रधानमंत्री के लिए अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने और संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर भी होगा। संघ के शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी चर्चाएं न केवल संगठनात्मक सुदृढ़ता पर केंद्रित होंगी, बल्कि भारत की सामाजिक और राजनीतिक दिशा पर भी प्रभाव डालेंगी।
RSS के ‘गुरु जी’ को देंगे सम्मान
30 मार्च को नरेंद्र मोदी की नागपुर RSS मुख्यालय में हो रही यह बैठक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के सम्मान में हो रही है। उन्हें ‘गुरु जी’ के नाम से भी जाना जाता है। वह RSS के स्वयंसेवकों और समर्थकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। इसलिए इस पूरे मामले को और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मोदी गुड़ी पड़वा पर माधव नेत्रालय की आधारशिला रखेंगे जो एक आधुनिक नेत्र अस्पताल और अनुसंधान केंद्र होगा. गुड़ी पड़वा मराठी नव वर्ष है। इस दिन पीएम मोदी गोलवलकर के नाम से इन कार्यों का शुभारंभ करके उन्हें सम्मान देंगे.

मोदी-भागवत भविष्य के भारत के निर्माण पर करेंगे चर्चा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय, नागपुर, में संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा को तय करने वाला एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस मुलाकात में राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक उत्थान, आत्मनिर्भर भारत और युवाओं को राष्ट्रनिर्माण में अधिकाधिक भूमिका देने जैसे विषयों पर मंथन होगा। संघ हमेशा से राष्ट्रवाद, स्वदेशी, शिक्षा और संस्कारों के प्रचार-प्रसार का पक्षधर रहा है, और प्रधानमंत्री मोदी की नीतियां भी इन्हीं मूल सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही हैं। देश को आतंरिक और बाहरी चुनौतियों से सुरक्षित करने के लिए ठोस रणनीति अपनाने पर भी बातचीत होगी.
संघ की टकसाल से निकले इस राष्ट्रनायक का नागपुर आगमन केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि एक विचारधारा की शक्ति का प्रमाण है, जिसने उन्हें भारत का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया। यह यात्रा उनके अटूट विश्वास, उनकी विचारधारा और उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है—एक ऐसा प्रतीक, जो आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति और राष्ट्र-निर्माण की दिशा को और अधिक सशक्त बनाएगा।