IAS Akhil Arora  : बजट बनाने में माहिर, हर मुख्यमंत्री ने किया भरोसा, अपने काम से बनाई अलग पहचान

सरकारें बदलीं, सत्ता की धुरी घूमी, लेकिन राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी में एक नाम पर प्रदेश के हर मुखिया का भरोसा कायम रहा. चाहे वसुंधरा राजे हो, अशोक गहलोत हो या फिर भजनलाल शर्मा, हर मुख्यमंत्री ने इनकी काबिलियत और ईमानदारी पर आंख मूंदकर भरोसा किया. प्रदेश के सबसे ताकतवर IAS में से एक होने के बावजूद इन्होंने पद और दिखावे को कभी अपनी ताकत नहीं बनाया, बल्कि अपने काम से एक नई पहचान गढ़ी. वो ऑफिसर हैं IAS अखिल अरोड़ा, जिनका आज जन्मदिन है. इस खास मौके पर हम बता रहे हैं उनके प्रशासनिक सफर के बारे में….

डूंगरपुर, बीकानेर व जयपुर के कलेक्टर रहे

अखिल अरोड़ा अपने करियर के शुरुआती वर्षों में अलवर के एसडीओ रहे. फिर 1997 में ये करीब एक वर्ष के लिए वित्त विभाग, जयपुर में अतिरिक्त आयुक्त के पद पर रहे. नवंबर 1999 में इन्हें डूंगरपुर का जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट बनाया गया. अखिल अरोड़ा बीकानेर और जयपुर जिले के भी कलेक्टर रहे. बाद में, कई पदों पर अपनी सेवा देते हुए ये जून 2008 में जयपुर नगर निगम के निदेशक बने. 2010 में वे जयपुर मेट्रो रेल निगम लिमिटेड में मैनेजिंग डायरेक्टर रहे जबकि 2011 में वे वित्त विभाग, जयपुर में सचिव बनाये गए. वित्त विभाग के क्षेत्र में उनके पास लंबा अनुभव है. कांग्रेस से लेकर भाजपा सरकार तक में उन्होंने इस विभाग की जिम्मेदारी संभाली है. राज्य में पेश होने वाले बजट को तैयार करने में उन्होंने कई वर्षों तक अपनी सेवा दी है. इस तरह से देखा जाए तो अखिल अरोड़ा राज्य में सबसे लम्बे समय तक वित्त विभाग में अपनी सेवा देने वाले अधिकारी हैं.

राजे सरकार में बने डिजिटल बदलाव के आर्किटेक्ट

वसुंधरा राजे सरकार में राजस्थान में डिजिटल बदलाव का दौर बड़े जोरशोर से चल रहा था. उस समय राज्य के डिजिटल परिवर्तन और स्टार्टअप इकोसिस्टम को आकार देने में आर्किटेक्ट की भूमिका अखिल अरोड़ा ने ही निभाई. उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग (DoIT&C) में आयुक्त और प्रधान सचिव के रूप में कार्य करते हुए मुख्यमंत्री के “डिजिटल राजस्थान” के सपने को ज़मीन पर उतारा. स्टार्टअप्स के लिए iStart, ई-गवर्नेंस को मज़बूती देने के लिए राजस्थान स्टैक, युवाओं को तकनीक से जोड़ने के लिए हैकाथॉन, Digifest, IT Day और Challenge for Change जैसी पहल में अरोड़ा की महत्वपूर्ण भूमिका थी. आज देश के दूसरे राज्य भी यह जानना चाहते हैं कि राजस्थान इतनी तेज़ डिजिटल छलांग कैसे लगा पाया? यह कहीं न कहीं अखिल अरोड़ा जैसे ऑफिसर की विजनरी सोच और मेहनत का ही नतीजा है.

बजट बनाने में महारत हासिल

ACS अखिल अरोड़ा वित्त मामलों में बेहद कुशल हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारों ने इसे बहुत पहले भांप लिया था. यही वजह है कि सरकार चाहे जिसकी भी रहे, लेकिन वे हमेशा प्रासंगिक बने रहे. अखिल अरोड़ा जनता और सरकार दोनों की नब्ज अच्छी तरह जानते हैं इसलिए इन्हें लोकप्रिय बजट बनाने में भी महारत हासिल है. पहली बार इन्होंने अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री के रूप में दूसरे कार्यकाल के दौरान अगस्त 2011 से दिसंबर 2013 तक वित्त विभाग में सचिव (बजट) के रूप में काम किया। बाद में, जब गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने नवंबर 2020 में फिर से वित्त विभाग की बागडोर अरोड़ा को सौंप दी। इस दौरान उन्होंने लगातार तीन बजट तैयार किए. उनके कार्यकाल के दौरान, आरजीएचएस, मुफ्त दवा , मुफ्त स्मार्टफोन जैसी योजनाओं के बावजूद प्रदेश को कभी वित्तीय संकट का सामना नहीं करना पड़ा। जब भाजपा 2023 में सत्ता में वापस आई, तो तमाम अटकलों के विपरीत, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपने पहले दो बजटों की जिम्मेदारी उनको सौंपी.

मां के निधन पर पेश की कर्तव्यपरायणता की मिसाल

राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी में आईएएस अखिल अरोड़ा को धीर गंभीर, संजीदा एवं नेक दिल इंसान माना जाता है। वर्ष 2022 में उनपर राज्य के वित्त विभाग की जिम्मेदारी रहते उनकी मां का निधन हो गया था। उस वक्त अखिल अरोड़ा प्रदेश के बजट को अंतिम रूप देने की तैयारी में जुटे हुए थे। सूचना पर अखिल अरोरा घर पहुंचे। मां की अर्थी को कंधा देकर अंतिम संस्कार किया और फिर राज्य के बजट को अंतिम रूप देने में जुट गए. इस तरह के मार्मिक पल में भी उन्होंने अपने कर्तव्य के पालन में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

दबाव के आगे कभी नहीं झुकने वाले ऑफिसर

प्रशासन में कठिन फैसले टाले नहीं जा सकते. बस देखना यह होता है कि उन्हें कैसे और किस नीयत से लिया जाता है. अखिल अरोड़ा उन अधिकारियों में माने जाते हैं, जो दबावों के बावजूद कठिन निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते. इनके फैसलों में यह साफ़ दिखता है कि ये लोकप्रियता से अधिक संस्थागत हितों को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि अखिल अरोड़ा के कई निर्णय तत्काल सराहे न गए हों, लेकिन समय के साथ उनकी डिसिजन मेकिंग का लोहा हर किसी ने माना है.

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