सदन में लोकतंत्र की दुहाई देने वाले वामपंथियों की असलियत उस वक्त सबके सामने आ गई, जब केरल से मनोनीत राज्यसभा सांसद सी सदानंदन मास्टर ने अपने कृत्रिम पैर सदन की मेज पर रख दिए. यह देश में कम्युनिस्ट हिंसा का जीता-जागता सबूत था.
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान सदानंदन मास्टर ने जब बोलना शुरू किया, तो वे खड़े नहीं हो सके. कारण उन्होंने खुद बताया. 31 साल पहले केरल में सीपीएम कार्यकर्ताओं ने उनके दोनों पैर काट दिए थे. उनका अपराध सिर्फ इतना था कि वे आरएसएस से जुड़े थे और समाजसेवा कर रहे थे.
महज 30 साल के थे सदानंदन मास्टर
साल था 1994, तारीख 25 जनवरी. उस दिन सदानंदन मास्टर अपनी बहन की शादी तय कर चाचा के साथ घर लौट रहे थे. रास्ते में सीपीएम कार्यकर्ताओं ने उन्हें बस से उतारा, जमीन पर पटका और बेरहमी से पीटना शुरू किया. फिर घुटनों के नीचे से दोनों पैर काट दिए, ताकि दोबारा जुड़ ही न सकें. हमलावर “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाते रहे और एक युवा शिक्षक को ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज बना दिया.
उस वक्त सदानंदन मास्टर की उम्र महज़ 30 साल थी. वे गांव-गांव जाकर बच्चों को पढ़ाते थे, समाज को जोड़ते थे. लेकिन वामपंथियों के गढ़ में रहकर समाजसेवा करना और आरएसएस से जुड़ना उन्हें मंजूर नहीं था. धमकाया गया, डराया गया और जब वे नहीं झुके, तो उनकी टांगें काट दी गईं.
संसद में सच बोला तो मच गया हंगामा
राज्यसभा में अपने पहले भाषण के दौरान सदानंदन मास्टर ने जैसे ही अपने कृत्रिम पैर मेज पर रखे, सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास और कुछ विपक्षी सांसदों ने आपत्ति जताई. यानी जिनके कार्यकर्ताओं ने पैर काटे, वही आज “मर्यादा” की बात करने लगे. सभापति सीपी राधाकृष्णन ने स्पष्ट किया कि सांसद यह बताना चाह रहे हैं कि वे खड़े होकर क्यों नहीं बोल सकते।
लोकतंत्र पर ज्ञान, काम खून बहाने का
सदानंदन मास्टर ने दो टूक कहा कि सीपीएम जैसी पार्टियों की प्रतिबद्धता लोकतांत्रिक मूल्यों से नहीं, बल्कि राजनीतिक हिंसा से है. संसद में ये लोकतंत्र की बातें करते हैं, लेकिन जमीन पर खून बहाते हैं. उन्होंने कहा कि राजनीतिक हिंसा किसी भी देश के लोकतंत्र को कमजोर करती है और जो आज सबसे ज्यादा लोकतंत्र का शोर मचाते हैं, वही सबसे बड़े अपराधी हैं.
पैर टूटे लेकिन हौसला नहीं
दोनों पैर गंवाने के बाद भी सदानंदन मास्टर रुके नहीं. कृत्रिम पैरों के सहारे समाजसेवा जारी रखी. उनके साहस और समर्पण को देखते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया. आज अपने मजबूत हौसले की वजह से वे संसद में बैठे हैं.