मौत की धमकी के बावजूद भी अनकही दास्तानों को बता रहें विवेक अग्निहोत्री
विवेक अग्निहोत्री. बहुमुखी प्रतिभा के धनी. फिल्म निर्देशक, निर्माता और पटकथा लेखक, स्तंभकार और सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों पर मुखर सार्वजनिक वक्ता. लेकिन इनका ऐसा होना कुछ लोगों को कतई रास नहीं आ रहा है. ऐसा भी नहीं है कि यह सब यकायक ही हो गया है. इनके दुश्मन बन बैठे लोगों की इनसे कोई निजी खुन्नस भी नहीं है भला. बस उनकी पीड़ा इतनी भर है कि इतिहास के पन्नों में जो सच दफन है उस हकीकत को विवेक अग्निहोत्री उजागर नहीं करें. भारतवर्ष में कितने ही नरसंहार हुए वो सब के सब दबा दिये गए, तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले कुर्सी के लालची नेताओं द्वारा. बस इन्ही परतों को उधेड़ रहे हैं विवेक अग्निहोत्री.
जिन्ना और मुस्लिम लीग द्वारा डायरेक्ट एक्शन डे से किया गया कत्लेआम
‘द ताशकंद फाइल्स’ ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद अब ‘द बंगाल फाइल्स’. सभी के निर्देशक एक ही हैं, विवेक अग्निहोत्री. इनकी पुरानी फिल्मों की तरह ‘द बंगाल फाइल्स’ भी तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले राजनेताओं एवं इनके समर्थकों को रास नहीं आ रही हैं. बावजूद इसके की इनकी फिल्मों में वही सब कुछ दिखाया गया है जो कि वास्तविकता में घटित हुआ है. अपनी फिल्मों के कारण मौत की धमकी तक पा चुके विवेक अग्निहोत्री की आगामी फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ 05 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी जिसका ट्रेलर लांच हो चुका है. ट्रेलर का धमाका और बवाल दोनों कम नही हैं. साल 1946 में जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को लेकर डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा की उस समय बंगाल का मुख्यमंत्री सुहरावर्दी था. सुहरावर्दी ने कलकत्ता के हिंदुओं का कत्लेआम करने में कोई कसर नहीं छोडी. कलकत्ता के सभी 24 थानों से हिंदु पुलिस अधिकारी हटा दिए गये थे, इनमें से 22 में मुस्लिम इंस्पेक्टर तैनात कर दिए गए थे, वहीं बाकी बचे दो थानों का जिम्मा एंग्लो-इंडियन इंस्पक्टर पर था. लीग के खास पुलिस अधिकारी शम्स-उद-दोहा को कलकत्ता के डीसीपी की कुर्सी पर बिठा दिया गया था. पूरी प्लानिंग के साथ सुहरावर्दी ने हिन्दुओं के कत्लेआम का षड्यंत्र रचा और फिर उसे अंजाम दिया. उस समय कलकत्ता की जनसंख्या में हिंदुओं की आबादी 73 प्रतिशत थी, फिर भी हिंदु समुदाय 23 प्रतिशत मुसलमानों के सामने लाचार था. उन्हें न तो सरकार से मदद मिल रही थी, न ही पुलिस से.
गोपाल मुखर्जी ‘पाठा’ बनें हिन्दुओं के रक्षक, सुहरावर्दी की निकली हेकड़ी
जब सुहरावर्दी और मुस्लिम लीग हिंदुओं का कत्लेआम कर रहे थे उस समय हिंदुओं को बचाने के लिए वे लोग सामने आए, जिनसे कलकत्ता का भद्रलोक घृणा करता था। उन्हें गुंडा कहा जाता था. ऐसे ही दो लोग थे गोपाल पाठा और जुगलचंद्र घोष. जब बंगाल का पूरा बंगाली भद्रलोक अपने-अपने घरों में जा छुपा था तब इन्हीं लोगों ने बेबस हिंदुओं की रक्षा की और मुस्लिम दंगाइयों से हिसाब चुकता करने का संकल्प लिया और अपने नौजवान साथियों के साथ मुस्लिम दंगाइयों से हिंदुओं की रक्षा की. डायरेक्ट एक्शन डे पर हिंदुओं का कत्लेआम करने वाले सुहरावर्दी की सारी हेकड़ी तीसरे दिन ही निकल गई. १८ अगस्त की रात जब वह पुलिस कंट्रोल रूम पहुंचा तो उसने देखा कि इस बार हिंदू नहीं, बल्कि मुसलमान फोन लगाकर मदद की गुहार कर रहे हैं. वायरलैस सेट पर भी मुस्लिम बस्तियों के जलने की खबर आ रही थीं. यह देखकर सुहरावर्दी के होश उड़ गए. पूर्व आइसीएस अधिकारी अशोक मित्रा की माने तो उस दिन लाल बाजार के पुलिस कंट्रोल रूम में सुहरावर्दी बुदबुदाते हुए खुद से बोल रहा था, ”उफ… मेरे बेचारे बेगुनाह मुसलमानों।”
‘हंसिए’ ने निभाई ‘आधे चांद’ से दोस्ती
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का निशान ‘हंसिया’ था तो मुस्लिम लीग का निशान था ‘आधा चांद’. दोनों की पुरानी दोस्ती जगजाहिर थी. ये वही कम्युनिस्ट पार्टी थी जिसने हमेशा मुस्लिम लीग द्वारा की गई पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया था. और तो और कैबिनेट मिशन के सामने भी कम्युनिस्ट पार्टी ने देश को १७ टुकडों में बांट देने का प्रस्ताव दिया था. मुस्लिम लीग की रैली में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु भी थे, उनकी कम्युनिस्ट पार्टी पाकिस्तान के निर्माण के समर्थन में थी. ऐसे भी आरोप हैं कि कलकत्ता की हिंसा में लीग के साथ कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ लोगों ने भी हिस्सा लिया था. केसोराम कॉटन मिल के उड़िया मजदूरों पर जानलेवा हमला करने वाली भीड़ का नेतृत्व टेक्सटाइल यूनियन के कम्युनिस्ट नेता सैयद अब्दुल्ला फारूकी ने किया था. कलकत्ता में जब हिंदू अपने ऊपर हुए खूनी अत्याचारों का बदला लेने लगे तो वामपंथी संगठनों ने अमन कमेटिया बनाकर ‘शांति-शांति’ चिल्लाना शुरू कर दिया. यहां तक कि ‘बंगाल के कसाई’ सुहरावर्दी ने जब एक शांति-मार्च निकाला तो बसु भी उसमें शामिल हुए.
गांधी कैसे ‘महात्मा’ थे जिनकी नजर में हिंदुओं का मरना हिंदुस्तान में इस्लाम का शुद्ध हो जाना था
अपनी २८ और ३१ अगस्त की प्रार्थना सभाओं में गांधी ने कहा, ‘कलकत्ता की घटनाओं पर मेरा मौन रहना ही सही है’. २ सितंबर १९४६ को गांधी ने ‘हरिजन’ में ‘जहर की काट’ शीर्षक लेख लिखा जो ८ सितंबर को प्रकाशित हुआ. गांधी ने लिखा,
”अगर कलकत्ता के सारे हिंदु अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए बहादुरी से मर-मिटते तो वह न केवल हिंदु धर्म को बल्कि पूरे हिंदुस्तान को बचा लेते। इससे हिंदुस्तान में इस्लाम भी शुद्ध हो जाता” गांधी का मानना था कि कलकत्ता के हिंदुओं को बदला लेने के बजाए अहिंसा का पालन करते हुए मर जाना चाहिए था.